बिहार और उड़ीसा लोक मांग वसूली अधिनियम, 1914: मुख्य विवरण
रामू गाँव के वकील साहब के पास भागा। वकील साहब ने बताया, "घबराओ मत रामू, तुम्हारे पास नोटिस मिलने के आपत्ति (Objection) दर्ज करने का अधिकार है।"। रामू ने धारा 9 के तहत एक याचिका दायर की, जिसमें उसने बताया कि बैंक ने ब्याज की गणना गलत की है। "घबराओ मत रामू
प्रमाण पत्र जारी होने के बाद, यह एक 'डिक्री' (Decree) के समान माना जाता है, जो सिविल न्यायालय द्वारा पारित हो। इसका अर्थ यह है कि इस बकाये को लेकर अब साधारण सिविल कोर्ट में अलग से मुकदमा दायर करने की आवश्यकता नहीं होती, और वसूली की कार्रवाई सीधे इस प्रमाण पत्र के आधार पर शुरू हो जाती है। "घबराओ मत रामू
अधिनियम के तहत वसूली की शक्ति "सर्टिफिकेट ऑफिसर" के पास होती है, जो आमतौर पर कलेक्टर या उनके द्वारा नियुक्त कोई अधिकारी होता है। "घबराओ मत रामू